बैठ जाता हु मिट्टी पर अक्सर क्योकि मुझे अपनी औकात अच्छी लगती है, मैने समुंदर से सीखा है जीने का सलीका चुपचाप से बहना और अपनी मोज में रहना|| ऐसा नही है की मुझमे कोई एब नही है, पर सच कहता हूँ मुझे में कोई फरेब नही है| जल जाते है मेरे अंदाज से मेरे दुश्मन क्यूकि एक ज़माने से न मैने महूबत बदली नहीं दोस्त बदले है| एक घडी खरीद कर हाथ में क्या बाध ली ये वक्त पीछे ही पड़ गया मेरे || सोच था घर बना कर आराम से बैठूगा.... पर घर की ज़रूरतो ने मुसाफिर बना डाला !!! सुकुन की बात मत कर ऐ ग़ालिब......... वो बचपन वाला इतवार अब नही आता शोक तो माँ बाप के पैसे से पुरे होते है....... आपने पैसो से तो बस ज़रूरते ही पूरी हो पाती है........... जीवन की भाग दोड में क्यों वक्त से साथ रंगत चली जाती है---------- 2 हस्ती खेलती जिंदगी भी आम हो जाती है एक सवेरा था जब हस कर उड़ा करते थे हम और आज तो कई बार बिना मुस्कराए ही शाम हो जाति है| कितने दूर निकल गये हम रिश्तों को निभाते-निभाते खुद को खो दिया हमने, अपनों को पाते पाते... लोग कहते है हम मुस्कराते बहुत है और ह...
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